लेखनी से निकले हुए शब्द उन पलों का अहसास है जो वक़्त की समय रेखा पर समय ही लिखवाता है...........
Thursday, March 29, 2012
Tuesday, March 27, 2012
कीमत
हर शै की एक कीमत
होती है
मुस्कान हो या
ज़िंदगी
हर एक को
अपने अपने ढंग
से
उसकी कीमत चुकानी
पड़ती है
छोटी सी हंसी
भी
आंसुओं के सैलाब
को पार करके ही
लबों पर सजाई
जाती है
गमों के सहरा
से गुजर कर ही
एक पल की खुशी
हासिल होती है
ज़िंदगी भर हम
ढूंढते हैं जिस
सुकून के पल को
उस पल की मंजिल
भी
जीवन-क्षितिज
की सीमा होती है
Saturday, February 11, 2012
कश्मकश
सही
और गलत की कशमकश मैं उलझ कर
रह
गया है हर रिश्ता
सही
होते हुए भी गलत हो जाना
गलत
को सही मान लेना
कभी
मजबूरी है
कभी
जरूरी
रिश्तों
की गर्माहट
नजाकत
और
सजावट
सही
गलत की दायरे मैं
घूमती
रहती है
इस
पहेली को सुलझा पाना
सीधी
सड़क पर आये
अचानक
मोर जैसा है
चलते
हुए कदम का
ठिठक
कर रुक जाने जैसा है
फिर
भी सब कोशिश करते हैं
हंसी
का इनाम
तो
कभी
आँसू
का पैगाम
बदले
मैं पा जाते हैं
Saturday, December 17, 2011
सिर्फ तुम
चाँद की हर कला में
सूरज की हर किरण में
बारिश की बरसती बूंदो में
पलकों की झिमिलाती झालर में
संगीत के हर साज़ में,
साज के हर सुर में
पहली ओस की पायल में
फूलों की हर शै में
भवरों की उस गुंजन में
होठों की हर जुंबिश में
खनकती चूड़ियों की हर खनकार में
पायल की हर रून-झुन में
बस तुम हो
तुम ही तुम हो
सूरज की हर किरण में
बारिश की बरसती बूंदो में
पलकों की झिमिलाती झालर में
संगीत के हर साज़ में,
साज के हर सुर में
पहली ओस की पायल में
फूलों की हर शै में
भवरों की उस गुंजन में
होठों की हर जुंबिश में
खनकती चूड़ियों की हर खनकार में
पायल की हर रून-झुन में
बस तुम हो
तुम ही तुम हो
Thursday, October 20, 2011
सवाल
सवालों के घेरों में घिरी है ज़िंदगी
हर नया पल एक नया सवाल को जन्म देता है
हर अगला पल पिछले सवाल का जवाब ढूंढ लेता है
ये एक चक्रव्युह
है
जहां इंसान बस सवाल बन कर रह जाता है
सुबह से शाम तक बस सवाल ही सवाल
रात से सुबह तक बस
सवाल ही सवाल
प्रश्न-चिन्ह बन कर रह गई है ज़िंदगी
खुद अपने से ही सवाल पूछते हैं,
यहाँ क्यूँ हैं हम
कहाँ जायेंगे यहाँ से हम
कहाँ से आये और
किस दिशा में जाएंगे हम
क्यूँ नहीं ढूंढ लेते
कुछ सवालों के जवाब हम
कब होगा सवालों का
अंत-हीन सिलसिला
Saturday, October 8, 2011
बदलते सपने
वक़्त बदल जाता है,
सपने बदल जाते हैं,
बदलता वक़्त सपनों को
भी बदल जाता है।
मुसकुराते हुए पहले सपने,
कब आँख मूँद कर सो जाते
हैं;
उन सपनों तक जाने वाले
रास्ते ,
कब, तीखा मोड़ लेकर खो जाते हैं,
यह वक़्त को भी नहीं पता
चलता।
उड़ते हुए पल अपने साथ,
सध्यजात औ पूर्णता की दहलीज
पर पहुंचे हुए सपने ,
पलों की पंखो पर सवार होकर,
क्षितिज बिन्दु में गुम
हो जाते हैं।
उनकी जगह चुपके से
आ कर बैठ जाते हें,
अनसोचे अनदेखे अंछुए
कोरे नकोर नवीन स्वपन,
पल की किस क्षण में,
हमसफर, हमकदम बन जाते हें,
यह वक़्त भी नहीं जानता।
क्या जानता है कोई ,
बदलती खुशियाँ बदलते गम,
सपनों के अधूरे पूरे होने
के
क्षण बादल देते हैं।
शायद, यही ज़िंदगी का सच है
बदलता वक़्त सपनों की ज़िंदगी
भी
बदल देता है।
Tuesday, September 13, 2011
MY MOM
Sometimes I catch myself
Thinking, "When I phone,
I can talk of this or that!"
Then remember, I'm alone
She was always there
To answer my calls -
To listen to my "small talk"
Or when I climbed the walls.
At times, I didn't feel like talking
And somehow, she understood -
Didn't say she wished I'd call
Or make me feel like I should.
Now, I wish I would have
More times, to show I cared -
To say, just how important
Were, all those times we shared.
I could have shown my love
So much more than I did -
I never, did it enough
Even when I was a kid.
Now it's too late to do or say
All those things I wish I had -
No way to ease the pain inside
When my heart is sad.
She was my "anchor" to this life -
The "rock", that I clung to -
The place, where I could turn
When, nowhere else would do.
Now, the ravages of time
Have worn my "rock" away -
And all I have to cling to
Are memories of yesterday.
Thinking, "When I phone,
I can talk of this or that!"
Then remember, I'm alone
She was always there
To answer my calls -
To listen to my "small talk"
Or when I climbed the walls.
At times, I didn't feel like talking
And somehow, she understood -
Didn't say she wished I'd call
Or make me feel like I should.
Now, I wish I would have
More times, to show I cared -
To say, just how important
Were, all those times we shared.
I could have shown my love
So much more than I did -
I never, did it enough
Even when I was a kid.
Now it's too late to do or say
All those things I wish I had -
No way to ease the pain inside
When my heart is sad.
She was my "anchor" to this life -
The "rock", that I clung to -
The place, where I could turn
When, nowhere else would do.
Now, the ravages of time
Have worn my "rock" away -
And all I have to cling to
Are memories of yesterday.
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