रिश्ते जिंदगी है या जिंदगी से रिश्ते,
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जिंदगी बीत गयी बनते बिगड़ते,
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रिश्तों की जिंदगी और जिंदगी के रिश्ते।
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मन की डोर से बंधे,
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सहलाते, बहलाते,लुभाते, मन के रिश्ते,
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प्यार से झुकते,प्यार के लिए झुकते,
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मन से जुड़े, मन तक जुड़े,
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रुलाते, हँसाते, जिंदगी के रिश्ते।
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जाने-पहचाने, फिर भी अनजाने,
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मन से बांधे, फिर भी मन से बेगाने,
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क्यूँ ये होते हैं, मन के दीवाने,
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रिश्तों से पहचान, पहचान से रिश्ते,
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अनजाने-पहचाने जिंदगी के रिश्ते।
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मुश्किल से जुड़ते,पल में टूट जाते,
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सिमटते, बिखरते, बनते, संवरते,
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यादों में बसते, खुद याद बन जाते,
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यादों से निकल सामने आ जाते,
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भूले भटके, जिंदगी के रिश्ते।
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होठों की मुस्कान, जीने का अरमान,
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खुद से खुद की पहचान कराते ये रिश्ते,
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आँखों के आँसू, साँसो की डोर,
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सीने में काँच जैसे चुभते ये रिश्ते,
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कोमल नाजुक कुछ कठोर ये रिश्ते।
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शब्द बनकर कागज पर उतरते,
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गीत बनकर होठों पर सजते,
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भाव बनकर गीत बन जाते,
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अहसास बनकर गजल बन जाते,
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‘लेखनी’ की स्याही में सिमटते ये रिश्ते।
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लेखनी से निकले हुए शब्द उन पलों का अहसास है जो वक़्त की समय रेखा पर समय ही लिखवाता है...........
Sunday, June 5, 2016
रिश्ते
Sunday, April 17, 2016
कुछ पल
कुछ पल
बीते पलों को पीछे छोड़ कर,
गुजरे पलों का इतिहास बना कर,
कुछ नए पल ढूंढ कर लाएँ,
आज चलो, नए कुछ
पल सजाएँ।
पल जो बीता, वो माना
बीत गया,
अब होठों पर सजा एक गीत नया,
आँखों में बसा कुछ स्वप्न नए,
आज चलो, नए कुछ
पल सजाएँ।
बीते पलों ने कुछ आँसू दिये,
कुछ हंसी तो कुछ अरमान दिये,
सारे ख़ज़ाने से कुछ मोती बीन
लाएँ,
आज चलो, नए कुछ
पल सजाएँ।
अरमान नए, कुछ स्वप्न
नए,
जीवन-आकाश के इंद्र्धनुष नए,
होली से रंग, दीवाली
की चमक चुराएँ,
आज चलो, नए कुछ
पल सजाएँ।
नए दस्तखत, नए अल्फ़ाज़,
नयी ‘लेखनी’ की नयी
रोशनाई,
नयी दुनिया में पहचान नयी बनाने,
आज चलो, नए कुछ
पल सजाएँ।
Thursday, December 31, 2015
एक नयी शुरुआत
पल बीता, कल बीता,
लो आज एक नयी सुबह हुई,
नए सपनों, नए रंगो की,
एक नयी शुरुआत हुई।
क्या खोया, क्या पाया,
क्या मिला और क्या गवाया
हमने,
सब भूल के चलो आगे बड़ें,
इस नयी सोच के साथ
एक नए सपने, नए होंसले की
आज फिर एक बात हुई,
नए सपनों, नए रंगो की,
एक नयी शुरुआत हुई।
कुछ ठोकर, कुछ पत्थर,
कुछ घाव तो कहीं कुछ कांटे मिले,
फूल कहीं तो हंसी कहीं पर
और कहीं कुछ ख्वाब भी मिले,
मिलना-बिछड़ना के मेल से आगे,
और अनेक बात हुई,
नए सपनों, नए रंगो की,
एक नयी शुरुआत हुई।
इंद्र्धानुषी रंगो को लेकर
आज कुछ नए स्वप्न बुने,
राह में बिखरे कांटो से हटकर,
फूलों सजाकर,एक नयी राह चुनें,
नयी उमंग, नयी तरंग,नए हौंसलों
को लिए मन में,नयी सुबह की बात हुई,
नए सपनों, नए रंगो की,
एक नयी शुरुआत हुई।
ठिठक कर पीछे न देखने की,
मन से मन की बात हुई,
“कलम” में नयी स्याही भर कर,
नयी लिखावट की शुरुआत हुई,
नए सपनों, नए रंगो की,
एक नयी शुरुआत हुई।
Tuesday, December 22, 2015
सवाल-जवाब
कुछ सवाल पूछती है ज़िंदगी,
जवाब दूँ, या खामोश रहूँ,
यह भी एक सवाल है;
गम और खुशी का मेल है ज़िंदगी,
इन्हे सौगात समझूँ, या उलझन,
हर पल यही ख़याल है;
मिलन-विछोड़ा, जीवन के दिन रात हैं,
शाश्वत-सत्य यह मान लूँ, या भुला दूँ,
हर पल उठते सवाल है;
सवाल-जवाब और उलझनों के माया-जाल
में
फंसी-उलझी ज़िंदगी, रुकूँ या चलूँ,
पल पल चलते सवाल हैं;
‘कलम’ की नोक पर सहम कर अटकी ज़िंदगी,
दर्द और खुशी के सैलाब में
डुबूँ या पार उतरूँ,
न हल होने वाले या कुछ सवाल
है।
Thursday, February 19, 2015
यादें
ये यादें भी बहुत अजीब होती
हैं,
कुछ यादें,बुरा
स्वप्न सी
सीने में दफ्न हो जाती हैं,
तो कुछ यादें,
जीवन-बन को महका देती हैं।
मुस्काते लबों पर
अश्रु-शबनम बिखेर देती हैं,
पर कुछ यादें
रोती आँखों को मुस्कुराहट से
भर देती हैं।
बड्ते कदम को रोक
देती हैं ये यादें,
तो कुछ,
रोके कदमों में
जान डाल देती हैं ये यादें।
कुछ यादें,
जीवन भर का
साथ बन जाती हैं ,
वहीं कुछ,
कपूर बन
पल में हवा में घुल जाती हैं।
सीने में शूल बन चुभ जाती हैं
कुछ यादें,
तो कुछ
साँस में बस जाती जाती हैं
ये यादें
फिर भी,
ये यादें ही जीवन का सहारा
है,
तो कुछ,
जीना मुश्किल कर देती हैं
ये यादें।
Friday, December 26, 2014
कुछ बाकी है अभी.....
बहुत कुछ जान लिया है
फिर भी कुछ जानना बाकी है अभी;
काफी कुछ पहचान लिया खुद को,
फिर भी बहुत कुछ पहचानना बाकी
है अभी।
राहें ढूँढी हैं प्यार करने
की मगर,
मुश्किलों के पड़ाव तय करने
बाकी हैं अभी;
अहसासों के समुंदर जीत लिए
हैं बहुत, लेकिन,
नजरियों के भँवर पार करने बाकी
हैं अभी।
रिश्तों के बाग-बगीचे खिल गए
अनगिनत,
छोटी-छोटी खुशियों की कलियों
का खिलना बाकी है अभी;
नन्हें नन्हें कदमों से सारा
जग तय तो कर लिया है लेकिन,
उम्मीदों के छोटे छोटे पड़ाव
तय करने बाकी हैं अभी।
बहुत कुछ देखा और लिखा जा चुका
है अब तक,
बहुत कुछ सुना और कहा जा चुका
है अब तक;
धरती को कागज और अंबर को कैनवास
बना लिखने के लिए
‘लेखनी’ का अनंत सफर बाकी है अभी......
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