Thursday, February 10, 2011

कुछ कहना है

चलो आज फिर से कलम उठाई जाये
कुछ नया और कुछ पुराना
दर्द हो या अफसाना
कागज पर उतार लिया जाये l

बसंती हवा के साथ साथ
खिड़की से चली आयी है
खट्टे मीठे पलों की यादें ,

अपनो के साथ खुल कर हँसना
रूठना मनाना
पहरों बतियाना
बात बेबात पर
यूँ ही ठहाके लगाना

सब कहीं पीछे छूट गया l

मौसम की तरह जिनदगी ने ली अंगड़ाई है
चारो और मस्तानी रुत सी छाही है

फिजा में आज फैले हैं
नयी नवेली चाहतें और सपने
संजोये-सवारें हैं जो मिल कर हमदोनों नें
हम दोनों का ..
पल पल
रूठना मनाना
बात बेबात पर
यूँ ही शरमा जाना, इठला जाना,

आँचल में बिखरा-सिमटा सा है
अनोखा अनमोल सलोना सा प्यार
सबसे छुपा कर सबको दिखा कर
देखे सपनों का निराला संसार
पलकों पर आ अटका है
देखे अनदेखे सपनों का खुमार

कहने को है बहुत कुछ
शब्द है कम
लिखने की आदत रही नहीं
चेहरे पर लिखी इबारत पढने
लगे हैं हम







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