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Friday, July 8, 2016

बचपन


निंदियाई आँखों को खोल कर
मंद-मंद मुस्काता बचपन,
बंद मुट्ठी को बार बार तान कर
मेरी ओर हाथ बढ़ाता बचपन।

घुटने के बल सरक कर,
डगमगाता सम्हल्ता बचपन,
तुतलाते बोलों से मन आँगन
जीवन बगिया महकाता बचपन।

मिट्टी के घरोंदों में घर ढूँढता,
पापा के जूते पहन ऑफिस जाता बचपन,

भूख नहीं कहकर मचलता, ज़िद करके
अपनी ही बात मनवाता बचपन।

पीछे मुढ़ कर,दूर तक देखने पर भी,
न दिखाई देता है बचपन,
आज खाली कागज सी जिंदगी पर
आड़ी-तिरछी लकीरें खिचने वाला बचपन,

याद आता है, वो भोला बचपन,
जिंदगी के सफर में,
किसी अंजान स्टेशन पर उतर गया
जैसे वो अंजान मुसाफिर का बचपन,
क्या मिल सकता है, फिर से
वो हमारा खोया बचपन,
मुंह-मांगी कीमत देकर भी
वापस लौटाया जा सकता है बचपन।



Tuesday, December 22, 2015

सवाल-जवाब



कुछ सवाल पूछती है ज़िंदगी,
जवाब दूँ, या खामोश रहूँ,
यह भी एक सवाल है;

गम और खुशी का मेल है ज़िंदगी,
इन्हे सौगात समझूँ, या उलझन,
हर पल यही ख़याल है;

मिलन-विछोड़ा, जीवन के दिन रात हैं,
शाश्वत-सत्य यह मान लूँ, या भुला दूँ,
हर पल उठते सवाल है;

सवाल-जवाब और उलझनों के माया-जाल में
फंसी-उलझी ज़िंदगी, रुकूँ या चलूँ,
पल पल चलते सवाल हैं;

कलम की नोक पर सहम कर अटकी ज़िंदगी,
दर्द और खुशी के सैलाब में डुबूँ या पार उतरूँ,
न हल होने वाले या कुछ सवाल है।







Thursday, February 19, 2015

यादें


ये यादें भी बहुत अजीब होती हैं,
कुछ यादें,बुरा स्वप्न सी
सीने में दफ्न हो जाती हैं,
तो कुछ यादें, 
जीवन-बन को महका देती हैं।

मुस्काते लबों पर
अश्रु-शबनम बिखेर देती हैं,
पर कुछ यादें
रोती आँखों को मुस्कुराहट से भर देती हैं।

बड्ते कदम को रोक
देती हैं ये यादें,
तो कुछ, रोके कदमों में
जान डाल देती हैं ये यादें।

कुछ यादें, जीवन भर का
साथ बन जाती हैं ,
वहीं कुछ, कपूर बन
पल में हवा में घुल जाती हैं।

सीने में शूल बन चुभ जाती हैं
कुछ यादें, तो कुछ
साँस में बस जाती जाती हैं ये यादें

फिर भी,
ये यादें ही जीवन का सहारा है,
तो कुछ,
जीना मुश्किल कर देती हैं
ये यादें।