Sunday, April 17, 2016

कुछ पल

कुछ पल
बीते पलों को पीछे छोड़ कर,
गुजरे पलों का इतिहास बना कर,
कुछ नए पल ढूंढ कर लाएँ,
आज चलो, नए कुछ पल सजाएँ।

पल जो बीता, वो माना बीत गया,

अब होठों पर सजा एक गीत नया,
आँखों में बसा कुछ स्वप्न नए,
आज चलो, नए कुछ पल सजाएँ।

बीते पलों ने कुछ आँसू दिये,
कुछ हंसी तो कुछ अरमान दिये,
सारे ख़ज़ाने से कुछ मोती बीन लाएँ,
आज चलो, नए कुछ पल सजाएँ।

अरमान नए, कुछ स्वप्न नए,
जीवन-आकाश के इंद्र्धनुष नए,
होली से रंग, दीवाली की चमक चुराएँ,
आज चलो, नए कुछ पल सजाएँ।

नए दस्तखत, नए अल्फ़ाज़,
नयी लेखनी की नयी रोशनाई,
नयी दुनिया में पहचान नयी बनाने,
आज चलो, नए कुछ पल सजाएँ।







Thursday, December 31, 2015

एक नयी शुरुआत


पल बीता, कल बीता,
लो आज एक नयी सुबह हुई,
नए सपनों, नए रंगो की,
एक नयी शुरुआत हुई।

क्या खोया, क्या पाया,
क्या मिला और क्या गवाया
हमने,
सब भूल के चलो आगे बड़ें,
इस नयी सोच के साथ
एक नए सपने, नए होंसले की
आज फिर एक बात हुई,
नए सपनों, नए रंगो की,
एक नयी शुरुआत हुई।


कुछ ठोकर, कुछ पत्थर,
कुछ घाव तो कहीं कुछ कांटे मिले,
फूल कहीं तो हंसी कहीं पर
और कहीं कुछ ख्वाब भी मिले,
मिलना-बिछड़ना के मेल से आगे,
और अनेक बात हुई,
नए सपनों, नए रंगो की,
एक नयी शुरुआत हुई।


इंद्र्धानुषी रंगो को लेकर
आज कुछ नए स्वप्न बुने,
राह में बिखरे कांटो से हटकर,
फूलों सजाकर,एक नयी राह चुनें,
नयी उमंग, नयी तरंग,नए हौंसलों
को लिए मन में,नयी सुबह की बात हुई,
नए सपनों, नए रंगो की,
एक नयी शुरुआत हुई।
ठिठक कर पीछे न देखने की,
मन से मन की बात हुई,
“कलम” में नयी स्याही भर कर,
नयी लिखावट की शुरुआत हुई,
नए सपनों, नए रंगो की,
एक नयी शुरुआत हुई।





Tuesday, December 22, 2015

सवाल-जवाब



कुछ सवाल पूछती है ज़िंदगी,
जवाब दूँ, या खामोश रहूँ,
यह भी एक सवाल है;

गम और खुशी का मेल है ज़िंदगी,
इन्हे सौगात समझूँ, या उलझन,
हर पल यही ख़याल है;

मिलन-विछोड़ा, जीवन के दिन रात हैं,
शाश्वत-सत्य यह मान लूँ, या भुला दूँ,
हर पल उठते सवाल है;

सवाल-जवाब और उलझनों के माया-जाल में
फंसी-उलझी ज़िंदगी, रुकूँ या चलूँ,
पल पल चलते सवाल हैं;

कलम की नोक पर सहम कर अटकी ज़िंदगी,
दर्द और खुशी के सैलाब में डुबूँ या पार उतरूँ,
न हल होने वाले या कुछ सवाल है।







Thursday, February 19, 2015

यादें


ये यादें भी बहुत अजीब होती हैं,
कुछ यादें,बुरा स्वप्न सी
सीने में दफ्न हो जाती हैं,
तो कुछ यादें, 
जीवन-बन को महका देती हैं।

मुस्काते लबों पर
अश्रु-शबनम बिखेर देती हैं,
पर कुछ यादें
रोती आँखों को मुस्कुराहट से भर देती हैं।

बड्ते कदम को रोक
देती हैं ये यादें,
तो कुछ, रोके कदमों में
जान डाल देती हैं ये यादें।

कुछ यादें, जीवन भर का
साथ बन जाती हैं ,
वहीं कुछ, कपूर बन
पल में हवा में घुल जाती हैं।

सीने में शूल बन चुभ जाती हैं
कुछ यादें, तो कुछ
साँस में बस जाती जाती हैं ये यादें

फिर भी,
ये यादें ही जीवन का सहारा है,
तो कुछ,
जीना मुश्किल कर देती हैं
ये यादें।






Friday, December 26, 2014

कुछ बाकी है अभी.....






बहुत कुछ जान लिया है
फिर भी कुछ जानना बाकी है अभी;
काफी कुछ पहचान लिया खुद को,
फिर भी बहुत कुछ पहचानना बाकी है अभी।

राहें ढूँढी हैं प्यार करने की मगर,
मुश्किलों के पड़ाव तय करने बाकी हैं अभी;
अहसासों के समुंदर जीत लिए हैं बहुत, लेकिन,
नजरियों के भँवर पार करने बाकी हैं अभी।

रिश्तों के बाग-बगीचे खिल गए अनगिनत,
छोटी-छोटी खुशियों की कलियों का खिलना बाकी है अभी;
नन्हें नन्हें कदमों से सारा जग तय तो कर लिया है लेकिन,
उम्मीदों के छोटे छोटे पड़ाव तय करने बाकी हैं अभी।

बहुत कुछ देखा और लिखा जा चुका है अब तक,
बहुत कुछ सुना और कहा जा चुका है अब तक;
धरती को कागज और अंबर को कैनवास बना लिखने के लिए
लेखनी का अनंत सफर बाकी है अभी......



Saturday, December 20, 2014

साथ-साथ




नदी के दो किनारे
साथ चलते हैं पर मिलते कभी नहीं
जुड़े हैं नदी के बहाव से,
साथ बहते हैं, पर जुडते कभी नहीं,

क्षितिज के छोर पर धरा-गगन,
मिले दिखाई देते हैं पर मिलते कभी नहीं
हमसफर तय करते हैं सफर साथ चलते हुए,
चलते हैं साथ मगर, फासले फिर भी मिटते नहीं।

प्रकर्ति का शायद नियम भी यही है,
मिलते हुए भी अलग-अलग रहना,
साथ होते हुए भी एक-दूसरे से जुदा रहना,
लेकिन ....
जुदा होते हुए भी जुदा होते नहीं।

साथ-साथ चलने वाले कदम भी
एक राह के राहगीर होते हुए भी
एक शरीर से जुड़े होते हुए भी,
एक जान होते नहीं,
एक प्राण होते नहीं........






Friday, November 14, 2014

धरा


धरा का दुख न देखा किसी ने न जाना
धरा का प्रेम न छुआ किसी ने न माना
अंतस गहराई से बिंधी गई
बार बार छिली गई दुहराई गई
फिर भी मुस्कुराते हुए
नव कोंपल का उपहार जग को सौंप दिया

इक बूंद ओस की आस में
तड़कते मन को सम्हाले हुए
अमृत के मीठे जल को
नदी रूप में सागर को सौंप दिया

धरा फिर भी धारणी है
असीम दुख मन में धरण किये
असीम प्रेम जग को सौंप दिया
अश्रु समुंदर नैन सजाये
मीठा अमृत मानव मन को सौंप दिया